जिसम तक ही होती है इश्क की आखिरी मंजिल
कभी खुद को समझा कर देखा है क्या
खुद अपना सर दबा कर देखा है क्या
अपनी मुस्कुराहट ओके हो जाओ कायल
माथे से यह लकीरे हटाकर देखा है क्या
आंखें बुझ जाए जब किसी ख्वाब तले
तब पलकों की हकीकत सजाकर देखा है क्या
खुद से जूझते हो हर रोज आईने में बेवजह
इस शख्स को सांसो में बसा कर देखा है क्या
रेगिस्तान में फंसी कश्तियां लगेंगी तैरने
अपने भीतर कभी समंदर बहा कर देखा है क्या
खुदा बसता है हर एक बंदे में जनाब( ख्वाब )
अपना फैसला खुद को बता कर देखा है क्या
बन ही जाने दो आज तमाशा मेरा
यह बता मेरे प्यार को तू ने बख्शा था क्या
डर जाते हैं तूफानों की लहरें देखकर अक्सर
हालातों के इस तूफान में कश्ती चला कर देखा है क्या
अपनी बात से सबको हंसाते रहते हो
कभी खुद भी मुस्कुरा कर देखा है क्या
पढ़ते रहते हो शायरी अक्सर यहां वहां
कभी खुद भी शायरी बना कर देखा है क्या
ख्वाहिशें हजार है जिंदगी में
अपनों के खातिर वह ख्वाहिशें मिटाकर देखा है क्या
करते रहते हैं तारीफ हम दूसरों की ताकत का
कभी खुद को भी आजमा कर देखा है क्या
बाप की दौलत उड़ाना अच्छा है
पर कभी खुद भी कमा कर देखा है क्या
हर काम यहां होता है रब की मर्जी से
पर कभी अपने ख्यालों को नेक बनाकर देखा है क्या
जिसम तक ही होती है इश्क की आखिरी मंजिल
रूह से अपने महबूब को गले लगा कर देखा है क्या
मुहम्मद इक़बाल शाह
Khawab
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