Thursday, 16 April 2020

जिसम तक ही होती है इश्क की आखिरी मंजिल


जिसम तक ही होती है इश्क की आखिरी मंजिल

कभी खुद को समझा कर देखा है क्या
खुद अपना सर दबा कर देखा है क्या

अपनी मुस्कुराहट ओके हो जाओ कायल 
माथे से यह लकीरे हटाकर देखा है क्या

आंखें बुझ जाए जब किसी ख्वाब तले
तब पलकों की हकीकत सजाकर देखा है क्या

खुद से जूझते हो हर रोज आईने में बेवजह 
इस शख्स को सांसो में बसा कर देखा है क्या

रेगिस्तान में फंसी कश्तियां लगेंगी तैरने 
अपने भीतर कभी समंदर बहा कर देखा है क्या

खुदा बसता है हर एक बंदे में जनाब( ख्वाब )
अपना फैसला खुद को बता कर देखा है क्या

बन ही जाने दो आज तमाशा मेरा
यह बता मेरे प्यार को तू ने बख्शा था क्या

डर जाते हैं तूफानों की लहरें देखकर अक्सर
हालातों के इस तूफान में कश्ती चला कर देखा है क्या

अपनी बात से सबको हंसाते रहते हो 
कभी खुद भी मुस्कुरा कर देखा है क्या

पढ़ते रहते हो शायरी अक्सर यहां वहां 
कभी खुद भी शायरी बना कर देखा है क्या

ख्वाहिशें हजार है जिंदगी में
अपनों के खातिर वह ख्वाहिशें मिटाकर देखा है क्या

करते रहते हैं तारीफ हम दूसरों की ताकत का 
कभी खुद को भी आजमा कर देखा है क्या

बाप की दौलत उड़ाना अच्छा है
पर कभी खुद भी कमा कर देखा है क्या

हर काम यहां होता है रब की मर्जी से 
पर कभी अपने ख्यालों को नेक बनाकर देखा है क्या

जिसम तक ही होती है इश्क की आखिरी मंजिल
रूह से अपने महबूब को गले लगा कर देखा है क्या

मुहम्मद इक़बाल शाह
Khawab


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